hasmukh amathalal

Gold Star - 38,421 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

हम भी इतने मजबूर नहीं है hambhi itne - Poem by hasmukh amathalal

हम भी इतने मजबूर नहीं है!

प्रकृति का नियम है
इसपर हम सब कायम है
'बदलाव अपेक्षित ओर जरुरी है '
जिन्दगी की व्याख बहुत ही अधुरी है

बदला बदला और खोया खोया
इंसान है अभी सोया सोया
उसे आप पुछीये 'क्या है उसने पाया'?
समय पार वो क्यों नहीं जग पाया?

जिसने समय पर डंके की चोट लगा ली
समज लो उसने अपनी किश्ती पार कर ली
जो रह गया सोचते हुए की क्या होगा अब!
उसकी चाल धीमी हो गयी अब क्या करें रब!

हालत से समजौता करना अच्छी बात है
कुदरत भी इस बात से राजी और सहमत है
क्यों हम अड़े रहते है अपनी बात पर कायम?
'चाहे हम लुट जाए, बीखर जाए'बस येही है हमारा नियम

जो समय की चाल को परखते है
वो हमेशा जीवन में हँसते रहते है
बदल भी गरजकर बरस जाते है
फिर हम क्यों बार बार तरस खाते है?

जो धोखा देना जानते है और अपना स्वाभाव बना लिया है
उसे हम बदलाव नहीं मानते पर शुक्रिया करते है
आप रहे अपनी दुनियामे खुश हमें प्रस्ताव मंजूर नहीं है
दुनिया हमारी भी है खुशहाल हम भी इतने मजबूर नहीं है!


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Poem Submitted: Wednesday, October 16, 2013

Poem Edited: Thursday, October 24, 2013


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