hasmukh amathalal

Gold Star - 52,941 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

'हम सुखी रहे'Ham Sukhi Rahe - Poem by hasmukh amathalal

उनका सौंदर्य से भरपूर बदन
मजबूर कर दिया करने मंथन
किस घडी मे बंनाया होगा स्वरुप!
छांट छांट के दिया होगा दिव्य रूप

वो जाजरमान है
ओर दैदीप्यमान भी
अकलप्य भि हैं उंनकी बुद्धिमानी
कभी ना की थी उन्होने मनमानी

मासूमियत चेहरे से छलक रही थी]
खुश्बु मानो महक महक कर रही थी
फूल भी आज तो उनके सामने शरमा जाते
किसी अजनबी को भी कुछ केहने पर मजबूर कर जाते

हमारे भाग्य मे ऐसी भार्या का आगमन था
हमारे घर मे उनका आवागमन चालूँ था
उन्होंने कभी हमारी गरीबी का क मज़ाक़ नहीं उड़ाया
बस हंसी खुशीं से छा गये ओर अवाक कर दिया।

औरत का यही रुप अक्सर देख्ने को मिलता है
सब की कल्पना के अनुरूप एक दूसरे को जोड़ता हैं
हो सकता है ऊपर से जोड़ी बनकर आती होगी
देखते ही उनकी शकल एकदम से सुहाती होगी।

मनमे गुदगुदी सी होती रहती है
सपने में भी उनको शक्ल दिखाई देती है
मानो घंटी खी आवाज क़ान मे गूंज रहीं हों
बारबार मानो कह रही हो 'में तुम्हारी तो हूँ'

दिन जल्दी से नज़दीक़ आ रहैँ हैं
हमें भी कुछ अजीब सी आशाएं जगा रहे हैँ
कैसा होगा हमांरा उनसे अदभूत मीलन?
चाँदनी से हो जाएगा हमारा जीवन शीतल।

हर दिन सुहाना होगा उनके सैंग
हर रातें, रंगीनिया से करेंगी जंग
जहाँ सिर्फ ख़ुशी खा माहोल होगा
दिल से मिलने वाला दिल कुबूल होंगा

सुहाग रात पर दखल ना देना
हमारे सपनो यूँ ही तोड़ ना देना
दूर से सिर्फ आशीर्वाद देंते रहैं
बस दुआ जरूर मांग लेना 'हम सुखी रहे'


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Poem Submitted: Thursday, May 15, 2014

Poem Edited: Thursday, May 15, 2014


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