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(17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

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पियु मारो गयो परदेस....Piyu maro

पियु मारो गयो परदेस

पियु मारो गयो परदेस
जियो ना लागे मारो इस देस
तडपु में बिन थारे इस वेश में
पड गयी हु दिल से पशोपेश में

घर में न लगे दिल ना बहार में
सब से उब गयी इस करारी हार में
न कभी सोचा था मिलेगी ऐसी विरानियाँ
कोस रही होगी मेहलोकी भी महारानोयाँ

काले काले बादल आसमान में गरज रहे है
विनती मेरी और अरज सुन भी रहे है
बिजली का काम है मुझको डराना
गम को बढ़ाना और दिल को गभराना

मे संवर भी रही हु और खुश भी हूँ
दिलकी बात किसको बताती भी हु
मुझे नाराजगी इस बात की नहीं है
राणाजी मेरे से दूर है यह भी तो हकीकत है

चल हवा धीरे से तू बहक ले
भीनी भीनी खुश्बू से हलकी महक ले
बिन बरसात गमो की बोछार
में मनाउ उसे जैसे लगे त्यौहार

राणाजी कब आओगे वापस अपने देस?
मै तो मरी मरी जाउंगी देखकर आपका भेस
कानाजी मुरली से मैंने क्या लेना?
आप से बस सुनना है रागनी का गाना

लगता नहीं दिल अब कई कई दिनॊ से
आप जो दूर रहे हो जोजन और मिलोसे
मैंने भी सफ़र कर ही लिया अपने मन की दृष्टि से
कैसी सुहानी रही आपकी याद इस सृष्टि से

में आत्म विभोर हो गयी
जब सुनी काली काली भाषा किशोर से
खो गयी सपनो की दुनिया मे इस कदर
जैसे टुकड़ा मिल गया हो छेदकर जिगर

Submitted: Thursday, July 11, 2013
Edited: Thursday, July 11, 2013


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Comments about this poem (A more and more by hasmukh amathalal )

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  • Mehta Hasmukh Amathalal (7/11/2013 3:56:00 AM)

    superb


    Rishabh Dave7 minutes ago
    nicely written
    Comment +1
    didn't understand


    Darron Ruffin5 minutes ago
    couldn't read it, it's in another language

    0 person liked.
    0 person did not like.
  • Mehta Hasmukh Amathalal (7/11/2013 3:41:00 AM)

    4 people like this.

    Hasmukh Mehta welcome badal, chandara, vinod n nilkamal
    a few seconds ago · Unlike · 1

  • Mehta Hasmukh Amathalal (7/11/2013 3:40:00 AM)

    Nisha Sarma likes this.

    Hasmukh Mehta welcome
    a few seconds ago · Unlike · 1

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