ajay srivastava

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राह मे बिछना - Poem by ajay srivastava

जो महगई बडाते है
जो आपस मे लडवाते है
जो नफरत को बडावा देते है
जो भ्रष्टाचार को बडावा देते है
ऐ काटो क्यों नही तुम इनकी राह मे बिछ जाते 11

जो भेद - भाव करते है
जो कानून को अपनी जेब मे रख कर चलते है
जिनका दीन ईमान बिक चुका है
और जो दूसरो पर अकारण हँसते है
ऐ काटो क्यों नही तुम इनकी राह मे बिछ जाते 11


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Poem Submitted: Saturday, July 13, 2013

Poem Edited: Saturday, July 13, 2013


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