Kumar Vishwas

(10 February 1970- / Pilkhuwa, Uttar Pradesh / India)

कुछ छोटे सपनो के बदले - Poem by Kumar Vishwas

कुछ छोटे सपनो के बदले ,

बड़ी नींद का सौदा करने ,

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !

वही प्यास के अनगढ़ मोती ,

वही धूप की सुर्ख कहानी ,

वही आंख में घुटकर मरती ,

आंसू की खुद्दार जवानी ,

हर मोहरे की मूक विवशता ,चौसर के खाने क्या जाने

हार जीत तय करती है वे , आज कौन से घर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !


कुछ पलकों में बंद चांदनी ,

कुछ होठों में कैद तराने ,

मंजिल के गुमनाम भरोसे ,

सपनो के लाचार बहाने ,

जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे ,

उन के भी दुर्दम्य इरादे , वीणा के स्वर पर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे


Comments about कुछ छोटे सपनो के बदले by Kumar Vishwas

  • Silver Star - 3,109 Points Abdulrazak Aralimatti (2/18/2015 5:55:00 AM)

    An inspiring poem for a true struggler (Report) Reply

    1 person liked.
    1 person did not like.
  • Gold Star - 14,919 Points * Sunprincess * (3/19/2014 11:13:00 AM)

    ...........beautifully written...enjoyed much.. (Report) Reply

  • Rookie Harshit Vishwakarma (4/16/2013 10:09:00 PM)

    awesome lines of SIR KUMAR VISHWAS (Report) Reply

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Poem Submitted: Thursday, April 5, 2012

Poem Edited: Thursday, April 5, 2012


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