hasmukh amathalal

Gold Star - 65,325 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

हमको खूब सताया है hamko khub - Poem by hasmukh amathalal

हमको खूब सताया है

दिल ना सोया
फिर खूब रोया
आँखों में उसका रूप समाया
दिल उसे कभी भुला ना पाया।

दिल रहता था खोया खोया
सामने उसको जब ना पाया
ये मेरी किस्मत ना बन पाया
जब भी याद किया, खूब रुलाया।

उसका दुर रहना, मनको ना भाया
मन ने भी अपना अफ़्सोस जताया
सपने me भी भुला ना पाया
सामने आयी तो कह ना पाया।

अब तो आ जा, नजरो के सामने
दुःख दुर कर दे, जो दिये है aapne
मेरी नजरें उपर देखती है
जाने उसमे क्या, क्या ढूंढती है?

तुम ही बता दो, इसका इल्म क्या है?
साथ में कह दो मेर झुलम क्या है?
नजरे तो सामने आ के मिला दो
गीले शिकवे है तो जड़ से मीटा दो

अब तो आ जा, नजरो के सामने
दुःख दुर कर दे जो दिये है अपने
मेरी नजरें उपर देखती है
जाने उसमे क्या, क्या ढूंढती है?

तुम ही बता दो, इसका इल्म क्या है?
साथ में कह दो मेर झुलम क्या है?
नजरे तो सामने आ के मिला दो
गीले शिकवे है तो जड़ से मीटा दो

में अनजान महोब्बत की राहपर
आंसू भी थमते नही मेरी आहपर
कुछ तो रहेमकर, मेऱी दीवानगीं पर
में तो अनभिग्न हूँ अपनी आवारगी पर।

तुम ही बता दो, इसका इल्म क्या है?
साथ में कह दो मेरा झुलम क्या है?
नजरे तो सामने आके मिला दो
गीले शिकवे है तो जड़ से मीटा दो

कुछ तो है तेरे छुपने का राज
में नहीं बांट सकता सब के साथ
हम दोनो का एक नजरिया है
ज़माने ने हमको खूब सताया है


Comments about हमको खूब सताया है hamko khub by hasmukh amathalal

Read all 9 comments »



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Thursday, May 8, 2014



[Hata Bildir]