milap singh


बादल की िकश्ती - Poem by milap singh

अँबर के दिरया में
बादल की िकश्ती
न जाने िकस ओर जा रही है

कुछ संभलकर
कुछ िबखरकर
नया रूप पा रही है

देखो-
सूरज की रौशनी में
कभी सोने का कभी चाँदी-सा
कभी इंद्रधनुष का रूप पा रही है
और सूरज के िबना
खूँखार -िबकराल
जैसे नाश का प्रतीक बना रही है

अँबर के दिरया में
यह बादल की िकश्ती
न जाने िकस ओर जा रही है


Poet's Notes about The Poem

इस किवता में गुरू के महत्ब को िदखाया गया है.

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Poem Submitted: Thursday, November 15, 2012

Poem Edited: Thursday, November 15, 2012


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