नन्हा-मुन्ना एक कबाड़ी Poem by Sushil Kumar

नन्हा-मुन्ना एक कबाड़ी

नन्हा-मुन्ना एक कबाड़ी।
उगी न मूंछ न आई दाढ़ी।
सात साल की उम्र थी उसकी।
करे खुशामद जिसकी-तिसकी।
घर-घर गली-गली में जाता।
जोरों से आवाज लगाता।
लोहा, बोतल, रद्दी कागज।
लेता और बेच कर आता।
इससे जो भी मिले मुनाफा।
उससे घर का खर्च चलाता।
तीन बहिन दो छोटे भाई।
बाप करे न कोई कमाई।
उलटे इसके पैसे छीने।
कहे रोज मुझको दे पीने।
माँ धोती घर-घर के बासन।
तब आता महीने का राशन।
अब ये ऋतू जाड़े की आई।
लेनी तो थी एक रजाई।
यही सोच माँ ने कुछ पैसे।
जुड़े - जुड़ाए जैसे - तैसे।
दिए पुत्र को गिनना भैया।
अब-तक कितने जुड़े रुपैया।
ताक़ रहा था बाप शराबी।
हो गया उन पैसों पर हाबी।
पीकर माँ - बेटे को मारा।
बाकी के जुए में हारा।
देख आँख में आंसू माँ के।
बालक बोला धीर बंधाके।
चिंता क्यों करती है माँ तू,
कल होगी कुछ अधिक कमाई।
सबसे पहले अपनी माँ को,
दूंगा लाकर एक रजाई।

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