Madhuraj Kumar

Rookie - 320 Points (Bagaha, Bihar)

दीप - Poem by Madhuraj Kumar

दूर अँधेरे में कहीं
इक दीप जलता है कोई
चीरती इस तम पटल को
रौशनी उसकी निरंतर
सन्नाटे में मौत के
ज़िन्दगी का नाम लेकर
लौ उसकी अभय अविचल
जल रही अनवरत पल पल
राह दिखाने उस पथिक को
पथ में ही जो खो गया है
भूला भटका मंजिल से वह
इस तमस में सो गया है
नयन उसके खोलने को
उसमें जीवन घोलने को
ज्योति जीवन की जली है
साँसें फिर से लौट चली हैं
हिम्मत फिर से बटोर कर
दुस्साहस कर जाने को
इस पल खुल कर जीने को
और इसी क्षण मर जाने को ।

Topic(s) of this poem: hope, light, motivation


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Poem Submitted: Sunday, November 15, 2015



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