ajay srivastava

Rookie - 91 Points (28/08/1964 / new delhi)

दुख - Poem by ajay srivastava

जीवन में बहुँत है परेशानी
जीवन में सुख का अनुभव
मनुष्य तो कर ही नही पाता
जीवन में बहुँत सुख तो दूर की बात है

प्रभु के पास इतना समय नही है दुख दे
यहँ तो मनुष्य ही है
जो दुख देने के लिय
समय निकाल लेता है

सच तो यह है हम सब की
समझ सही दिशा में नही हो पाती
और हम सब दूसरो पर दोशारोपण लगाते है
यही दुख कारण बन जाता है


Comments about दुख by ajay srivastava

  • Rookie - 139 Points Vaishnavi Singh (3/28/2015 4:47:00 AM)

    बहुत सुंदर कविता है. (Report) Reply

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Poem Submitted: Thursday, December 5, 2013



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