ajay srivastava

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स्वीकार है या नहीं? - Poem by ajay srivastava

अपना लो तो अपने भी पराए हो जाते है
त्याग दो तो पराए भी अपने हो जाते है
बिगडे काम बन जाते है त्याग दो तो
बने काम भी बिगडे जाते है अपना लो तो 11

जाति, पंथ, धर्म, वर्ग,
कोई भेदभाव नही मानता
हर किसी को अपना लेता है
नया कुछ भी नहीं है बहुत सरल बात 11

गुस्सा नियंत्रण मे रहे तो य़ोगी बना दे
दुनिया भर में विश्व शांति, भाईचारा और प्यार फैला दे
नियंत्रण से बहार तो क्रूर बना दे
युद्ध की स्थिति, अराजकता, अव्यवस्था, बेसुरापन बना दे
पसंद आपकी है आप क्या स्वीकार करते हैं?


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Poem Submitted: Thursday, August 29, 2013

Poem Edited: Thursday, August 29, 2013


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