Pawan lubana


वाह! बाद्ल तूने कया खेल दिखाया - Poem by Pawan lubana

पसीने से लतपत हुआ,
सड़्क पर चल रहा.
सूर्ज महाराज की गर्मी सहता,
मैं चल रहा.

म्नज़िल अभी दूर थी,
सूर्य का केहर था.
हालत मेरी बुरी थी,
ना जाने कितना चलना था.

कहीं से वह काले बाद्ल आए,
ठंडी हवा साथ लेकर आय.
गुड़-गुड़, गुड़-गुड़ की धुन गाए,
पानी की वह बूंदे टपकाए.

अब सूर्ज ना दिखाई दिया,
वह डर कर कहीं छिप गिया.
मैं खुशिओ से झूमने लगा,
वाह! बाद्ल तूने कया खेल दिखाया.

अब बारिश से लतपत हुआ,
घर को जा रहा.
ममी जी की डाँट सहता,
कपड़े अपने धो रहा.....


Poet's Notes about The Poem

I'm not a poet and this is my first and shall be my last poem. This poem is based on rainy season and little bit funny. I'm not sure that u will enjoy this poem but please read it and give me some comments about this

THANK YOU

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Poem Submitted: Sunday, June 30, 2013

Poem Edited: Thursday, July 25, 2013


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