Dr. Navin Kumar Upadhyay


शरदकालीन चन्द्रमा आज - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

स्वच्छ नीले नभ दिख आया,
शरदकालीन चन्द्रमा आज।
धरती जलाशय एकटक देखता,
अपना सुभग मुखड़ा आज ।।
हर सरोवर जल जब निहारता,
अपना निष्कलँक छबि आज ।
देखने को सब दौड़ आतुर आये,
जुड़ गये सब, धरती समाज ।।
लोगों की उँगलियाँ, उठ गईं ऊपर,
गुम हो गया, चाँद का अपना नाज।।
शशि एकटक निहारता धरती पर,
धरती समाज सब एकटक देख रहे।
स्निग्ध स्नेह भरे नयनों से अपलक,
चाँद, पव^त, नदी शोभा निरख रहे।।
हल्की घन घटा आसमाँ फहर रही,
चन्द्रमा की अमृतमय आभा सरस रही।
वृक्ष, वन, नदी, पेड़-पौधे निहार, खुश होते,
चाँद से मिलने को बाहें सबकी तरस रहीं।।
शरद शशि की मधुरमय शीतल किरणें,
सरोवर शीतल जल सुभग समा रहीं ।
देख देख शोभा 'नवीन'सराबोर बन रहा,
धड़कने दिल में प्यार, उमडा बरसा रहीं ।।
देखो, देखो, देखो भाई, सुन लो मेरे यारों,
आसमाँ में चाँद जो आज था नजर आया ।
वही चाँद, आज सभी लोगों ने देख, खुले आम,
सरोवर शीतल गहरे जल मिल जा समाया।।
यही चिरँतन सत्य है प्यारे,
सनातन सत्य मेरे प्रिय भाई।
सदा चाँद ने अपना रुप दिखाया,
फिर धरती में ले ली अँगड़ाई।

Topic(s) of this poem: nature love


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Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



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