Dr. Navin Kumar Upadhyay


गर्मी की दोपहर में - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

गर्मी की दोपहर में
कँक्रीट की सड़कों पर
दसो दिशाओं में आग जला
घँटो बदन रखाना
आसान काम है
लेकिन
जिन्दा रहकर
अपने स्व को
जला देना
कोई साधारण बात नहीं ।
माघ मास की
पूरी रात
गँगोत्री में
लेटे रहना
सरल काम ह
लेकिन
हिमालय की हवाओं बीच
मस्तिष्क ठँढ़ा रख लेना
सरल काम नहीं।
अमर बनने के लिए
सर को
हजार बार
काट देना
उमँग का भाव भलेै
लेकिन
खुद को जिन्दा रखे
मर जाना
अचरज की बात सही।

Topic(s) of this poem: life


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Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



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