Dr. Navin Kumar Upadhyay


आईने में चेहरा बार -बार न देख - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

आईने में चेहरा बार -बार न देख,
तुमसे भी ज्यादा सुँदर बन जायेगा।
उसकी ओर तुम गौर, फरमाना न कभी,
नहीं तो बेचारा बन दिल, मचल जायेगा।
अधर अरुणिम बना, न निहारना कभी,
नहीं तो तुझे चूमने को, वह सरक जायेगा।
कभी कनखियाँ मारना न, देख उसकी ओर,
वरना तेरी नजरों बीच, समाकर गड़ जायेगा।
अपने उन्मत्त बदन -नजारा न दिखाना उसे,
बेचारा भला दिल, मिलने को तरस जायेगा ।।
काले बालों को उसके सामने न लहराना तुम,
कहीं पकड़ लेने को, बाँहें अपना फैलायेगा ।
देखना न एकटक कर, नजर उसकी ओर,
नहीं तो प्यार सरस नयन उसका, बरस जायेगा।
दूर से ही देखना और अपना मुखड़ा, तुम प्यारे,
'नवीन' नहीं तो मैरा प्यार, शरमा जायेगा ।

Topic(s) of this poem: love


Comments about आईने में चेहरा बार -बार न देख by Dr. Navin Kumar Upadhyay

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



[Report Error]