Dr. Navin Kumar Upadhyay


लबों की आभा -अदा का मैं कैसे बयान करुँ - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

लबों की आभा -अदा का मैं कैसे बयान करुँ,
कुसुम, कमल, गुलाब, हिना, सभी फीके आते हैं।
तेरे लबों की खामोशी को दैख, खुदा बेचैन हुआ,
और पैदा हो गया, केवल तेरे लब निहारने को।
यह कहना बहुत कठिन है, यार!
कि खुदा ने तेरे लब को बनाया,
या
खुदा खुद भी,
तेरे लब से ही पैदा हुआ।
लबों पर ही नाम रहता है प्रियतम का,
लबोः पर ही वास रहता मुसुकन का।
लबों की हूक से दिल कसक उठती है,
बनकर बेचैन तलफती, तड़पती, तलहती है।
या खु़दा परवरदिगार! इतना जरुर तुम करना,
महबूब की लबो को, मेरी निगाहें सामने रखना।

Topic(s) of this poem: love


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Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



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