Dr. Navin Kumar Upadhyay


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Best Poem of Dr. Navin Kumar Upadhyay

कोई.कह.सकता कैसे

कोई.कह.सकता कैसे,
हम प्यार.नहीं करते,
कौन.कहता,
तेरे प्यार.दम.नहीं रखते;
क्या.बिना प्यार,
मेरी हैसियत.हो.सकती पूरी है;
क्या.बिना.मेरे.तेरी.हस्ती,
न.हो जाती अधूरी.है?
प्यार.ही वह मुकाम,
जहाँ जहाँ. न दो रहते.हैं,
यही वह विराम,
जहाँ दो प्रेम धार.मिलते.हैं;
जहाँ न कोई.जँग,
न केवल.अँग.-सँग.है,
जनम-जनम.न.जुदा होने.का.रँग.है,
नित्य -नित्य नव-नव.उमँग.
बढ़ने.का बहुरँगी ढँग है,
दीखते दोनों.के बदन.दो,
किंतु रहते सदा.एक;
परम अनन्यता.दोनों.मन-दिल,
बने.रहते सदा.एकरस. एक।
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